
stanford prison experiment : कमरे के कोने में एक लड़का दीवार से सिर टिकाए बैठा था। उसके चेहरे पर अजीब-सी थकान थी, मानो कई दिनों से नींद न मिली हो। दूसरे कोने में दो लड़के खुसुर-पुसुर कर रहे थे, जैसे किसी साज़िश की योजना बना रहे हों।
तभी एक और लड़का दरवाजे पर आया और चिल्लाया, ‘लाइन में खड़े हो जाओ, कैदियों! समय हो गया है।’ यह कोई असली जेल नहीं थी। यह तो स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी का एक तहखाना था, जिसे कुछ हफ्तों के लिए जेल में बदला गया था। लेकिन यहां जो कुछ हो रहा था, वह एक खेल नहीं रह गया था।
यह प्रयोग क्या था और किसने शुरू किया?
यह साल 1971 की गर्मियों की बात है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (Stanford university) के प्रोफेसर फिलिप ज़िम्बार्डो ने एक सामाजिक प्रयोग की योजना बनाई, जिसे स्टैनफोर्ड प्रिजन एक्सपेरिमेंट (Stanford prison experiment) कहा गया।
इसका मकसद यह समझना था कि इंसान कैसे भूमिका निभाते हुए अपने भीतर के व्यवहार को बदल देता है। खासकर जब कोई गार्ड हो और कोई कैदी।
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Stanford prison experiment का पहला दिन
चुने गए 24 छात्रों को दो समूहों में बांटा गया – गार्ड और कैदी। शुरू में सब कुछ सामान्य था। कैदियों को जेल की पोशाक दी गई और गार्ड्स को वर्दी, चश्मे और सीटी। पहला दिन एक हल्की भूमिका-निभाने जैसी एक्टिंग से शुरू हुआ। कैदी थोड़ा परेशान थे, लेकिन सब कुछ नियंत्रित लग रहा था।
दूसरा दिन: विद्रोह की चिंगारी
stanford prison experiment के दूसरे दिन माहौल बदलने लगा। कैदियों ने आजादी की मांग करते हुए विद्रोह किया। अपना बैरिकेड बनाना शुरू किया, खाने से इनकार कर दिया और गार्ड्स का विरोध करने लगे। गार्ड्स ने तुरंत सख्ती बरती। उन्होंने कैदियों को नंगा कर दिया, सेल में बंद कर दिया और मानसिक दबाव डालने लगे।
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तीसरा दिन : सत्ता का स्वाद
अब गार्ड्स के व्यवहार में गहराई से बदलाव आने लगा। वे आदेश देने में ज्यादा कठोर हो गए। उन्होंने कैदियों को जोर से व्यायाम करवाना शुरू किया, नींद में खलल डालना शुरू किया, और कभी-कभी उन्हें एक-दूसरे के खिलाफ उकसाना भी। कुछ गार्ड्स को यह भूमिका इतनी रास आने लगी कि वे अपने आप को असली गार्ड समझने लगे। दूसरी ओर, कैदी टूटने लगे थे।
Stanford prison experiment का चौथा से छठा दिन
चौथे दिन के बाद कैदियों की मानसिक स्थिति बिगड़ने लगी। कुछ रोने लगे, कुछ को पैनिक अटैक आने लगे। एक कैदी (#8612) ने तो मानसिक अस्थिरता की शिकायत की और उसे छोड़ा गया। लेकिन दूसरे स्टूडेंट्स ने खुद को असली कैदी मानना शुरू कर दिया था।
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स्टूडेंट्स को लगने लगा था कि उन्हें इसी जगह कैद रहना है। वे यह मांग भी नहीं रख पा रहे थे कि उन्हें प्रयोग का हिस्सा नहीं बनना और छोड़ दिया जाए। दूसरी ओर, गार्ड्स अब तानाशाह की तरह बर्ताव कर रहे थे।
इस तरह बंद हुआ प्रयोग
छठे दिन, जिम्बार्डो की एक सहयोगी क्रिस्टीना मस्लाच stanford prison experiment वाली जगह पहुंच गईं। वह जिम्बार्डो की मंगेतर थीं और बाद में उनकी पत्नी बनीं।
क्रिस्टीना ने जब स्टूडेंट्स की हालत देखी तो उन्होंने प्रयोग तुरंत रोकने के लिए कहा। जिम्बार्डो ने माना कि वो भी इस भूमिका में बह चुके थे और उन्होंने प्रयोग को छठे दिन ही बंद कर दिया।
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इस प्रयोग ने यह साबित किया कि जब इंसानों को सत्ता मिलती है, तो वे बहुत जल्दी निर्दयी बन सकते हैं – भले ही सत्ता नकली हो। छात्रों पर इस प्रयोग का गहरा मानसिक असर पड़ा, और सामाजिक मनोविज्ञान की दुनिया में यह अध्ययन एक चेतावनी की तरह गूंजने लगा।
Stanford prison experiment आज भी हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हालात हमारे भीतर के शैतान को बाहर ला सकते हैं?
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