
Aurangzeb History
मुगल इतिहास (Mughal History) में सत्ता संघर्ष की कई घटनाएं दर्ज हैं, लेकिन उनमें से एक बेहद चर्चित है, मुराद बख्श (Murad Bakhsh) और औरंगजेब (Aurangzeb) के बीच का विश्वासघात। इस कहानी में शक्ति, राजनीति और छल की एक जटिल गाथा छिपी है। इस संघर्ष की पूरी तस्वीर हमें दो विदेशी यात्रियों, इतालवी निकोलो मनूची (Niccolao Manucci) और फ्रांसीसी फ्रांस्वा बर्नियर (Francois Bernier) की रचनाओं से मिलती है।
शाहजहां (Shah Jahan) के अंतिम दिनों में जब वह बीमार पड़ा, तब उसके चारों बेटों – दारा शिकोह (Dara Shikoh), औरंगजेब (Aurangzeb), शुजा (Shuja) और मुराद बख्श (Murad Bakhsh) के बीच सत्ता की लड़ाई शुरू हो गई। बर्नियर के अनुसार, तीनों भाइयों को शक था कि दारा ने शाहजहां को जहर दिया है, इसलिए उन्होंने आगरा की ओर कूच करने का निर्णय लिया। (Aurangzeb History)
शुजा बंगाल से, औरंगजेब दक्कन से और मुराद बख्श गुजरात से निकल पड़ा। औरंगजेब के पास न तो शुजा जैसी सेना थी और न ही खजाना। ऐसे में उसने चालाकी और कूटनीति का सहारा लिया।
यह भी पढ़ें : एक फकीर के कत्ल के लिए औरंगजेब ने लिया धर्म का सहारा
औरंगजेब (Aurangzeb History) ने अपने सबसे छोटे भाई मुराद बख्श को चिट्ठियां भेजीं। बर्नियर के मुताबिक, औरंगजेब ने मुराद को लिखा, ‘मेरे भाई, हुकूमत में मेरा मन नहीं लगता। दाराशिकोह और शुजा तो अपना दबदबा बनाने की फिक्र में लगे हैं, लेकिन मैं फकीर की जिंदगी जीना चाहता हूं।
‘बादशाहत पर मेरा कोई दावा है ही नहीं, लेकिन मेरे मन की बात यह है कि दारा में हुकूमत करने की काबिलियत नहीं है। वह तो तख्त के लायक ही नहीं है क्योंकि वह काफिर है। तमाम उमरा उससे नफरत करते हैं। शुजा भी ताज संभालने लायक नहीं है। वह तो हिंदुस्तान का दुश्मन है।’
औरंगजेब ने ली धर्म की आड़ (Aurangzeb History)
इसके बाद औरंगजेब (Aurangzeb History) ने मुराद के सामने चारा डाला। वह लिखता है, ‘इतनी बड़ी सल्तनत को संभालने की काबिलियत सिर्फ आपमें है। तमाम उमरा भी यही सोचते हैं। वे आपके बेमिसाल हौसले की दाद देते हैं। वे राजधानी में आपके पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं। जहां तक मेरी बात है, तो जब आप बादशाह बन जाएं, मुझे अपनी सल्तनत में किसी शांत जगह पर रहने की इजाजत दे दीजिएगा। मैं वहां खुदा की इबादत करता रहूंगा।’
औरंगजेब (Aurangzeb History) ने मुराद को सूरत के किले पर फौरन कब्जा करने की सलाह भी दी क्योंकि वहां सल्तनत का बड़ा खजाना था। मुराद ने वह किला जीता और उसे अच्छी-खासी रकम मिली। इस बीच औरंगजेब की एक और चिट्ठी पहुंची। उसने मुराद से अब आगरा कूच करने को कहा।
यह भी पढ़ें : मुगलों की नाक काटने वाली रानी कर्णावती
बर्नियर लिखता है, ‘मुराद के भरोसेमंद हिजड़े और बहादुर सैनिक शाह अब्बास ने उससे अनुरोध किया कि वह औरंगजेब के कहने में न आए और आगरा की ओर न बढ़े। उसने कहा, आप उनसे बातचीत करते रहिए, लेकिन उन्हें अकेले आगरा जाने दीजिए। तब तक हमें आपके पिता के बारे में भी जानकारी मिल जाएगी। तब जो हालात बनेंगे, उसके मुताबिक कदम उठाइएगा।’
बर्नियर लिखता है, ‘लेकिन औरंगजेब की ओर से रोज ही खत चले आ रहे थे। मुराद बख्श ने शाह अब्बास की सलाह दरकिनार कर दी। मुराद अपना दबदबा कायम करने की चाहत में पगलाया हआ था। वह अहमदाबाद से निकल गया। पहाड़ों और जंगलों को पार करता हुआ उस जगह पहुंच गया, जहां औरंगजेब उसका इंतजार कर रहा था।’
औरंगजेब (Aurangzeb History) ने मुराद का भव्य स्वागत किया। बर्नियर लिखता है, ‘औरंगजेब ने मुराद से कहा कि उसने फौज केवल दारा से लड़ने के लिए बनाई है। उसका एक ही मकसद है कि अपने साझा दुश्मन दारा को हराया जाए और खाली सिंहासन पर मुराद को बैठाया जाए। दोनों की फौजें जब आगरा की ओर बढ़ीं, तो रास्ते में भी औरंगजेब ऐसी ही बातें करता रहा। उसने कभी भी मुराद का नाम नहीं लिया। हर बार उसे हजरत, बादशाह और जहांपनाह कहता रहा।’
यह भी पढ़ें : हिमालय पर उनका सामना किससे हुआ था?
‘हैरानी की बात है कि मुराद को औरंगजेब (Aurangzeb History) पर रत्ती भर भी शक नहीं हुआ। वह बादशाह बनने की चाहत में अंधा हो गया था। वह नहीं देख पाया कि अभी कुछ समय पहले गोलकुंडा को हड़पने की कोशिश में जिस व्यक्ति ने इतनी चालबाजियां कीं, उसके मन में फकीर की तरह जीने की चाहत नहीं हो सकती।’
आखिरकार मई 1658 में आगरा के पास सामूगढ़ (Battle of Samugarh) में दारा की फौज से औरंगजेब और मुराद का सामना हुआ। उस जंग में मुराद ने पूरे दमखम से औरंगजेब का साथ दिया। सामूगढ़ की उस लड़ाई में दारा हार गया। औरंगजेब और मुराद आगरा पहुंचे। औरंगजेब ने तमाम उमरा और राजाओं को अपने साथ जोड़ने की चाल चलनी शुरू कर दी।
बर्नियर लिखता है, ‘वह जो भी वादे कर रहा था, मुराद के नाम पर कर रहा था। हर फरमान मुराद के नाम पर जारी हो रहा था। औरंगजेब ऐसा बर्ताव कर रहा था, जैसे कि राजकाज उसका काम नहीं है और वह तो बस फकीर की जिंदगी जीना चाहता है।’
शाहजहां ने दारा को इस बीच दिल्ली रवाना कर दिया था। आगरा के किले का जिम्मा अपने मामा शाइस्ता खान को सौंपकर औरंगजेब भी दारा का पीछा करने को तैयार हो गया। उसने मुराद को भी अपने साथ आने को कहा। बर्नियर लिखता है, ‘मुराद के करीबियों, खासतौर से हिजड़े शाह अब्बास ने उसे बहुत समझाया कि वह औरंगजेब (Aurangzeb History) के साथ न जाए, दिल्ली और आगरा के आसपास अपने सैनिकों के साथ रहे।’
यह भी पढ़ें : जिन्ना से इतना चिढ़ता क्यों है पाकिस्तान?
लेकिन मुराद नहीं माना। वह औरंगजेब (Aurangzeb History) के साथ चल पड़ा। बर्नियर लिखता है, ‘दिल्ली के रास्ते में वे मथुरा में रुके। मुराद के करीबियों को कुछ अंदेशा हुआ, तो उन्होंने उसे एक बार फिर समझाया। उन्होंने कहा कि औरंगजेब ने कोई साजिश रची है। लिहाजा कम से कम आज वह कोई बहाना बना ले और उसके खेमे में न जाए। ऐसा होने पर औरंगजेब खुद उसके पास आएगा और हमेशा की तरह उसके साथ ज्यादा लोग नहीं होंगे।’
लेकिन मुराद नहीं माना। औरंगजेब(Aurangzeb History) ने उसे अपने खेमे में रात के खाने का न्योता भेजा और वह तैयार हो गया। ‘औरंगजेब ने मुराद की अगवानी की। मुराद की आंखों से खुशी के आंसू बह रहे थे। औरंगजेब ने इस मासूम शहजादे के आंसू पोंछे। रात का खाना शानदार था। अंत में शिराज और काबुल की शराब पेश की गई।’
औरंगजेब (Aurangzeb History) शराब नहीं पीता था, लिहाजा वह बाहर चला गया। मुराद बख्श शराब का शौकीन था। उसने खूब पी और गहरे नशे में सो गया। बर्नियर लिखता है, ‘औरंगजेब यही तो चाहता था। उसके साथी मीर खान ने मुराद की तलवार और कटार ले ली।
थोड़ी ही देर में औरंगजेब लौट आया। उसने मुराद को अपने पैर से कई बार धक्का दिया। जब उसकी आंखें खुलीं, तो औरंगजेब ने बड़ी हिकारत से कहा, यह कितने शर्म की बात है कि तुम बादशाह हो और तुम्हें होश ही नहीं है? दुनिया क्या कहेगी? ले जाओ इसे और इसके हाथ-पैर बांध दो।’
‘मुराद चीखता-चिल्लाता रहा, लेकिन पांच-छह सैनिकों ने उसके हाथ-पैर बांध दिए। मुराद के कुछ करीबियों ने खेमे में घुसने की कोशिश की, लेकिन मुराद के ही मुख्य तोपची ने ही उन्हें रोक दिया। औरंगजेब ने उसे अपनी ओर मिला लिया था।
माहौल शांत करने के लिए औरंगजेब के लोगों ने रात में ही यह बात फैलानी शुरू कर दी कि मुराद बख्श ने बहुत शराब पी ली थी और वह औरंगजेब से गालीगलौज करने लगा। लिहाजा उसे अलग ले जाना जरूरी हो गया। सुबह जब उसका नशा उतरेगा, तब उसे आजाद कर दिया जाएगा। इस बीच, रात में औरंगजेब ने अपनी और मुराद की सेना के तमाम लोगों को खूब पैसा बांटा। सुबह तक सब कुछ शांत हो चुका था।’
बर्नियर लिखता है, ‘औरंगजेब ने सोचा कि मुराद को एक पालकी में बंदकर दिल्ली भिजवा दिया जाए और नदी के बीच में बने सलीमगढ़ के किले में उसे कैद कर दिया जाए।’ शेरशाह सूरी ने 1546 में यमुना नदी के बीच में सलीमगढ़ का वह किला (Salim Garh Fort) बनवाया था। हालांकि मुराद को ग्वालियर के किले में कैद किया गया।
बर्नियर लिखता है, ‘ग्वालियर के किले में शाही खानदान के लोगों को कैद किया जाता था। वहां कैदियों को हर सुबह अफीम का पानी पिलाया जाता था। जो नहीं पीते, उन्हें खाना नहीं दिया जाता। अफीम के असर में धीरे-धीरे लोग बीमार हो जाते और मर जाते थे।
हालांकि औरंगजेब (Aurangzeb History) को भरोसा नहीं हुआ कि मुराद को हर रोज अफीम दी जाएगी या नहीं। लिहाजा उसने अहमदाबाद के एक सैयद को बुलाया। उसके बाप को मुराद ने मरवा दिया था। औरंगजेब ने उसके ही हाथों ग्वालियर के किले में मुराद का कत्ल करा दिया।’
बर्नियर लिखता है, ‘मुराद बख्श चाहता था कि दुनिया उसे ऐसे शख्स के रूप में जाने, जिसे अपनी तलवार और अपनी ताकत पर भरोसा था। इसमें कोई शक नहीं है कि वह साहसी था, लेकिन उस साहस को अगर सही दिशा मिल गई होती, अगर उसने अपने लोगों की सलाह पर अमल किया होता तो वह तीनों भाइयों पर भारी पड़ता और हिंदुस्तान का बादशाह बनता।’



